नोटा क्या होता है | चुनाव में इसके क्या प्रभाव होते हैं

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Nota None of the above

 

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन EVM में एक ऑप्क्शन होता है नोटा जिसका मतलब होता है None of the above. अगर आपकी उम्र 18 साल या फिर उससे ज्यादा है तो आप वोट डालने तो गये ही होंगे और अगर आप वोट डालने गये हैं तो नोटा का नाम तो सुने ही होंगे। आज हम इस पोस्ट में बात करने वाले हैं कि नोटा क्या होता है और इसका चुनाव पर क्या असर पड़ता है।

 

नोटा के बारे में जानने से पहले हम ये जान लेते हैं कि EVM यानी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन क्या होती है।

 

भारत में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन की शूरुआत 1982 में केरल के नार्थ पारापुर विधानसभा क्षेत्र में किया गया था। जबकि 2004 के लोकसभा चुनाव के बाद से हर लोकसभा और विधानसभा चुनाव में मतदान की प्रक्रिया पूरी तरह से इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी कि EVM के द्वारा सम्पन्न होती है।

भारत निर्वाचन आयोग ने 2013 के विधानसभा चुनाव में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी कि EVM में नोटा यानी कि None of the above का शुरुआत किया था।

 

नोटा क्या होता है।

 

कभी कभी ऐसा होता है कि कई जगह के लोग किसी भी उम्मीदवार के काम से संतुष्ट नहीं होते है। और किसी भी उम्मीदवार को अपना वोट नहीं देना चाहते हैं। तो लोगों को विरोध जाहिर करने के लिये भारत निर्वाचन आयोग ने एक ऐसा सिस्टम बनाया जिससे लोगों को सभी उम्मीदवारों को रिजेक्ट करने का अधिकार प्राप्त हो सके और इसके लिये लोग नोटा का इस्तेमाल कर सकते हैं। नोटा किसी चुनाव क्षेत्र के वोटर को ये अधिकार देता है कि वो उस क्षेत्र में खड़े सभी उम्मीदवारों में से किसी भी उम्मीदवार को अपना वोट न दे। यानी कि नोटा सभी उम्मीदवारों को खारिज़ करने का अधिकार देता है।

अगर आपको चुनाव में खड़े सभी उम्मीदवारों में से कोई भी उम्मीदवार पसंद नहीं है तो आप EVM में सबसे नीचे लगे नोटा के बटन को दबा सकते हैं।

आपको ध्यान देने वाली बात ये है कि नोटा को मिलने वाली वोटों की गिनती होती है लेकिन उन्हें इनवैलिड वोट माना जाता है। इसका मतलब ये है कि नोटा को मिलने वाले वोट किसी भी उम्मीदवार को नहीं मिलते है, और इनका हार या जीत में कोई रोल नहीं होता है।

 

नोटा को मिलने वाले वोटों से चुनाव पर क्या असर होता है

 

 

एस वाई कुरैसी के अनुसार अगर किसी क्षेत्र में 100 में से 99 वोट नोटा को मिलते हैं और एक वोट भी किसी उम्मीदवार को मिलता है तो उस उम्मीदवार को विजेता घोषित कर दिया जायेगा। और बाकी वोटों को अबैध करार दिया जायेगा।

इसे हम ऐसे भी समझ सकते हैं कि किसी विधानसभा या लोकसभा क्षेत्र में खड़े सभी उम्मीदवारों की जमानत जप्त हो जाती है तो जिस उम्मीदवार को सबसे ज्यादा वोट मिलते हैं उस उम्मीदवार को विजेता माना जाता है। कई बार ऐसा भी देखा गया है कि कहीं कहीं उम्मीदवारों से ज्यादा वोट नोटा को मिलते हैं।

2018 तक नोटा को एक इनवैलिड वोट माना जाता था। चुनाव पर नोटा का कोई भी असर नहीं होता था। 2018 के बाद नोटा को पहली बार उम्मीदवारों के बराबर का दर्जा मिला है। हरियाणा में 2018 में 5 जिलों में होने वाले नगर निगम चुनाव में हरियाणा चुनाव आयोग ने ये फैसला लिया था कि नोटा को जीतने के बाद सभी उम्मीदवार खारिज़ हो जायेंगे, और चुनाव को दुबारा कराया जायेगा और जो उम्मीदवार नोटा से कम वोट पायेगा वो इस चुनाव में दोबारा से खड़ा नहीं हो पायेगा। अगर दोबारा चुनाव होने पर भी नोटा को सबसे ज्यादा वोट मिलते हैं तो दूसरे स्थान पर आने वाले उम्मीदवार को विजेता घोषित कर दिया जायेगा। लेकिन अगर नोटा और किसी उम्मीदवार को बराबर वोट मिलते है तो इस परिस्थिति में उम्मीदवार को विजेता घोषित कर दिया जायेगा।

 

इन सभी तथ्यों को मिलाकर ये सामने आता है, की नोटा को वोट देंना एक प्रकार से अपने वोट को खराब करने है। यानी कि अगर आप नोटा को वोट देते हैं तो उस वोट का असर किसी भी उम्मीदवार के हार या जीत में कोई असर नहीं करता है।

नये नियम के अनुसार भी अगर नोटा को ज्यादा वोट मिलते है तो ज्यादा से ज्यादा ये होगा कि दोबारा चुनाव कराया जायेगा, और अगर दोबारा भी नोटा को ज्यादा वोट मिलते हैं तो भी दूसरे स्थान पर आने वाले उम्मीदवार को विजेता माना जायेगा। मतबल वो जीत जायेगा। तो नोटा एक प्रकार से अपने वोट को खराब करना होता है, तो अगर आप वोट देने जाते हैं तो नोटा को वोट न देकर किसी उम्मीदवार को ही अपना वोट दें।

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