जज और मजिस्ट्रेट में क्या अंतर होता है। Judge & Magistrate.

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जज और मजिस्ट्रेट में क्या अंतर होता है। Judge & Magistrate.

जज और मजिस्ट्रेट में फर्क जानने से पहले ये जानना जरूरी है कि केस कितने प्रकार के होते है।

केस दो प्रकार के होते हैं-

 

1. Civil Case (दीवानी मामला)

जहां पर बात आपके अधिकार की होती है आपके अधिकारों का कोई हनन करता है या बात हरजाने की होती है इस तरह के केस को Civil Case कहा जाता है जैसे कि प्रोपर्टी का अधिकार – आपके प्रोपर्टी पर आपका अधिकार है अगर आपके प्रोपर्टी पर कोई जबरन कब्ज़ा कर लेता है तो यहां पर आपके अधिकार का हनन हो रहा है तो आप अपने अधिकार के लिए जो केस आप फ़ाइल करते है वो सिविल केस होता है, इसी तरह आप कहीं जा रहे है और आपको रोका जा रहा है तो इसमें भी आपके अधिकार का हनन हो रहा है तो यहां पर भी जो केस बनेगा वो भी सिविल केस होगा। अगर आप किसी के साथ कोई पार्टनरसिप में काम शुरू किये है और आप उसे खत्म करना चाहते है तो यहां भी जो केस बनेगा वो सिविल केस होगा। अगर आप किसी के साथ कॉन्ट्रेक्ट साइन करते है और वो कांट्रेक्ट तोड़ देते है तो यहां भी जो केस बनेगा वो सिविल केस होगा, तो जितने भी इस तरह के केस होते है जहां पर हरजाना देना पड़ता है, अधिकर का हनन होता है वहां पर जो केस बनता है वो सिविल केस होता है।

2. Criminal Case (फौजदारी मामला)

अगर किसी मामले में सज़ा की डिमांड की जाती है तो इस तरह के केस को Criminal Case यानी कि फौजदारी मामले कहा जाता है। जैसे कि अगर आप किसी का मर्डर करते है या फिर किसी को जान से मारने की धमकी देते है तो यहां पर जो केस फ़ाइल होगा वो होगा क्रिमिनल केस। कुछ केस ऐसे होता हैं जो कि क्रिमिनल केस और सिविल केस दोनों होते हैं, जैसे कि मानहानि केस अगर आपका कोई मानहानि करता है और आप उससे हरजाना लेना चाहते हैं तो जो केस आप फ़ाइल करेंगे वो केस होगा सिविल केस लेकिन अगर आप उसे सजा दिलवाना चाहते है तो वो IPC में जायेगा और वो बनेगा क्रिमिनल केस।

अगर आप ये दोनों को एक बार समझ लेते है तो आपको ये समझना आसान हो जायेगा की जज और मजिस्ट्रेट में क्या फर्क होता है।

जज और मजिस्ट्रेट में फर्क-

जो सिविल मामलो की सुनवाई करते है उन्हें जज कहा जाता है और जो क्रिमिनल मामलो की सुनवाई करते हैं उन्हें मजिस्ट्रेट कहा जाता है उन्हें दंडाधिकारी भी कहा जाता है यानी कि वो सज़ा भी दे सकते हैं।

जज सिविल कोर्ट में बैठते हैं जबकि मजिस्ट्रेट सेशन कोर्ट में बैठते हैं। जब कोई केस कोर्ट में जाता है और वह सिविल केस है तो उसकी सुनवाई सिविल कोर्ट यानी कि दीवानी न्यायालय में होती है, यदि वो केस क्रिमिनल केस होता है तो उसकी सुनवाई सेशन कोर्ट यानी कि सत्र न्यायालय में होती है। सेशन में सुनवाई करने वाला मजिस्ट्रेट फांसी की सज़ा भी दे सकता है लेकिन उस पर हाई कोर्ट की मुहर होनी चाहिए।

आसान शब्दो मे कहें तो लोवर कोर्ट में जो सिविल मामलों की सुनवाई करता है उसे जज कहते है और सेशन कोर्ट में क्रिमिनल मामलों की सुनवाई करता है उसे मजिस्ट्रेट कहा जाता है। डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में जज को डिस्ट्रिक्ट जज कहा जाता है जबकि मजिस्ट्रेट को सेशन जज कहा जाता है। यही हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में दोनों एक हो जाते हैं और उन्हें जस्टिस या न्यायमूर्ति कहा जाता है। वो जो कहेंगे वही इंसाफ होगा वही कानून होगा।

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